Wednesday, September 21, 2016

Missing you Mumbai

आज यह ब्लॉग मैं मुम्बई को समर्पित करता हूँ। कोई कविता नहीं, कोई दार्शनिकता नहीं सिर्फ जो मैं मुम्बई से निकलने के बाद  याद कर रहा हूँ बस उसी के बातें!!!!

१४ जून २००७ जब मैं हज़ारो लोगों की तरह मुम्बई में आपने लिए नौकरी को तलाश में आया था।  नहीं जनता था की मुम्बई से प्यार करने लगूंगा। मैं मुम्बई की हर चीज  करता हूँ कहे वह लोकल ट्रैन की भीड़ ही या  पैर तक बहता पसीना।

तो आज बात करते हैं उसी प्यार की जो मैं पिछले ९ सालो से करता आया हूँ।

सबसे पहले बात करते हैं  मुम्बई की जीवन रेखा कही जाने वाली  लोकल ट्रेन्स की..

आपको एक  किस्सा सुनाता हूँ. एक बार हम ट्रैन में सफर कर रहे थे की एक मौलवी साहब ट्रैन में चढ़े उनके पीछे हज़ारो लोग चढ़े और पूरी ताक़त से उनकी और धक्का आया, और धक्का इतना ज़ोर से था की वे कह पड़े " या अल्लाह "। थोड़ी देर के बाद जब सब कुछ सामान्य हो गया तब उन्होंने पास में खड़े व्यक्ति से कहा पता है खुदा ने लोकल ट्रैन क्यों बनायीं क्योंकि वैसे तो आदमी से आदमी कभी ठीक से गले मिलेंगे नहीं  कम से कम यहाँ एक दूसरे से गले तो मिल रहे हैं।  गले क्या मिल रहे है आपन हक़ समझ कर गले तो पड़ रहे हैं।  सच ही बात कर रहे थे मौलाना साहब. आज के ज़माने में लोग एक दूसरे के सामने ठीक से मुस्कुराते तक नहीं और मुम्बई लोकल में लोग इन दूसरे से गले मिलते हैं, आगे वाले के कंधो पैर समाचार पत्र रख कर पढ़ते हैं।  यदि आप चाहे तो आपका बैग भी सही ठिकाने पर रखेंगे और तो और पूरे रस्ते उसका ध्यान भी रखेंगे।

अगर मुम्बई ऐसा शहर है तो कोई इससे क्यों प्यार न करे.

मेरे पास ऐसे कई किस्से हैं मुम्बई लोकल के बारे में। और यकीन मानिये हर  किस्से में मुम्बई की अच्छाई छुपी है।

बात करते हैं मुम्बई के खाने की।

अक्सर घर वाले पूछते हैं की मुम्बई ने तुजे दिया ही क्या है।  शुरुवाती दिनों में एक बार घर से निकले और अगर रस्ते में भूख लगे तो  जेब में पैसे तो ज्यादा होते नहीं थे तो ज्यादा नहीं सिर्फ ४ रुपये का वड़ा पाव खाइये और मस्त आगे बढिए।  और वह भी स्पेशल सुख चटनी  साथ.

अगर आप जवेरी बाजार मैं हैं तो भगत ताराचंद के यहाँ जाना न भूले. कहते हैं गुजरातियों के लिए छाछ ही बियर है भगत ताराचंद ने सच कर दिखाया बियर की बोतल में छाछ परोसते हैं।  हा हा  हा
और आप बटर रोटी मंगाइये और मक्खन का पूरा क्यूब पाइये।  दिल खुश हो जायेगा सच कह रहा हूँ।

आप गेट वे ऑफ़ इंडिया के पास जाकर छोटे मिया के यहाँ खाना खाये बगैर तो न ही आये तो अच्छा है।   मैं तो मांसाहारी नहीं हूँ पर जिन्हें मांसाहारी कहना पसंद है  उनके लिए तो यह जन्नत है जन्नत।

इसी के आसपास के क्षेत्र में कही बेहतरीन होटल्स हैं जैसे की अगर बीरियानी की इच्छा है तो डेल्ही दरबार चले जाइए।  अगर पूरी थाली आराम से बैठ कर कहानी हो तो शिवालय चले जाइये (सी  एस टी  स्टेशन के पास) .

अगर बहेतरीन पाव भाजी खानी है तो सामने कैनन पाव भाजी पैर चले जाइए. उसी  एक शरबत वाला है उसका जीरा मसाला भुलाये नहीं भूलता।
आइये मैं एक लिस्ट ही बना देता हूँ कहाँ क्या अच्छा मिलेगा.

ठाणे - स्टेशन के बहार कुञ्ज विहार का पूरी भाजी, मिस्सल पाव
घाटकोपर - राजवाड़ी  में  डोसा उसी के पास डिश गोला
भांडुप - स्टेशन के पास गणेश वड़ा पाव
घाटकोपर  - वेस्ट में खाऊ गली की हर आइटम.
दादर - श्री कृष्णा वड़ा पाव, ईस्ट में उडीपी
CST  - शिवालय थाली के लिए,
            कैनन - पाव भाजी उसके नज़दीक शरबत उसके थोड़ा आगे जाके डोसा स्पेसिअल्ली मैसूर मसाला
            उसके सामने आराम वड़ा पाव का वड़ा पाव , मिसल पाव , खरवस , फलाहारी मिसल, पियूष , साबूदाना             वड़ा, फलाहारी पूरी भाजी,
कोलाबा -  बड़े मियां, शेर ए पंजाब,
गिरगांव चौपाटी : बेचेलर्स आइसक्रीम.
मुम्बई सेंट्रल - सरदार पाव भाजी
अँधेरी - MIDC कैफ़े (TCS गेटवे पार्क ऑफिस के पास)
            दिलीप सैंडविच
            जो  डोसे आपने घाटकोपर में खाये उसके बच्चे लोग के हाथ के डोसे
            चाइना टाउन होटल अँधेरी ईस्ट स्टेशन के पास एक डोसा वाला है उसके यहाँ के बनाना डोसा..
मीरा रोड - पराठा हाउस, बालाजी रेस्टोरेंट
विरार - स्टेशन से बहार आते ही चाय.

 नन्ही सी सूचि  आपके लिए....

आप ये न सोचिये की मुम्बई में मैं सिर्फ कहना मिस  कर रहा हूँ रहा हूँ। मुम्बई के एक अगल उर्जा है जिसे शब्दो में नहीं कहा जा सकता..

और भी लिखूंगा मैं मुम्बई के  बारे में.. पढ़ते रहिये मेरे ब्लोग्स.

आपका
अंकित


Tuesday, March 22, 2016


Mere ghar ek mehman ko aana hai..
Aakar hum sab ko hasana hai..
Nanhi si jamhai aur kilkari ka shor..
Nanhe se haatho me aage ki dor..
Chehre ki muskan se sabko lubhana hai
mere
Ghar ek nanhe mehman ko aana hai….





कब था वो दिन आखरी बार.....
महसूस हुआ कुछ पहली बार...
जिंदगी के बवंडर में फसें हम ऐसे...
की याद नहीं कब हँसे थे हम पिछलीबार...

वो दोस्तों की महफ़िल..
वो अपनों  का आना जाना...
पापा की आँखे और माँ का प्यार...
ये सब हुआ कब आखरी  बार...

चंद नोटों के खातिर हम...
छोड़ आये बचपन की गालियां ....
दिखती दौलत को कमाने की खातिर...
अनजान खजाने को छोड़ आये..

ना जाने कब आएगा वक़्त मुस्कुराने का...
फिर उन अहातों में लौटने का...
वो झूलों पर झूलने का...
पेड़ की शाखों पर चढ़ फल तोड़ने का...

चलो मिलकर बनाये कुछ ऐसा मन्ज़र...
आने वालो को मिले वही गलियां और अहाते..
उनको न हो कभी पिछली बार का गम...
उनके लिए तो हो बस खुशियों का समंदर...





Friday, November 27, 2015

Bada aacha lagta hai...

yu tera muskurana...
yu aaisi hi rooth jaana..
Phir thoda sa chid jaana...
bada aacha lagta hai...

wo teri masoom si aankhen...
Wo teri natkhat si hasi...
wo tera sharmana..
Bada aacha lagta hai...

tujhe tekh ke mera khush ho jana...
barso se bichde hooe ka milna...
milkar tera gale lag jaana..
Bada aacha lagta hai..

kabhi kuch gungunana..
ya tera jor jor se gana....
kabhi kaushiki to kabhi jagjeet ko sunna..
bada aacha lagta hai...

thoda roothna thoda jhagadna...
Phir jhat se maan jaana..
to kabhi yu hi tera masti karna...
bada aacha lagta hai....
 



Sunday, August 2, 2015

Raastey...

ये रास्ते भी अजीब से होते हैं...
किसी को महबूबा से मिलाते हैं...
तो किसी को महफ़िल तक ले जाते हैं....
किसी को अपने घर तक तो....
किसी को अपनी मंज़िल तक ले जाते हैं....

कभी सोचता हूँ मैं ऐसा...
की ये रास्ते तो वही है..
पर राहगीर बदल जाता है....
पर असल में राहगीर भी वही है...
पर हालात बदल जाते है....

रास्ते तो बस हालातो को देखते रहते है..
कभी हँसते तो कभी रोते वक़्त को देखते हैं...
कभी ज़िन्दगी की रफ्तार तो कभी ख़ामोशी देखते हैं...
कभी युवा की मस्ती तो कभी किसी के आंसू देखते है...

चलो रास्तो से भी कुछ सीखते हैं..
बदलते हालातो में भी चलना सीखते हैं...
लोगो को मंजिल तक पहुचना सीखते हैं...
लोगों को थोडा हसाना भी सीखते हैं...
चलो रास्तो से भी कुछ सीखते हैं....

Saturday, April 11, 2015

તારી આંખો નો સથવારો....
મારા જીવન નો સહારો
તારી વાતો નો ભણકારો...
મારા દિવસો નો સહારો

હું કહું છુ કે દૂર છુ તારા થી...
હું કહું છુ  કે મજબૂર છુ મારા થી 
પણ તારી વાતો તો છે મારી પાસે
તો ક્યાં દૂર છુ  તારા થી.,,

તું જ છે મારા માં.
હું જ ચુ તારા માં...
જુદા તો આપડે થયા જ નથી....
કારણ કે હજી શ્વાસ છે મારા માં...

તું છે મારી સામે।.
હું છુ તારી સામે 
બન્ને આંખો નો સથવારો।...
આ જીવન નો સહારો।.........
 

Monday, March 30, 2015

તારી સાથે જયારે ચાલતો હતો..
જીવન નો કાંટો પણ ચાલતો હતો...
તારા કદમ ની એક અહટ થી...
મન ની ઠાધક પામતો હતો...
તારી સાથે જયારે ચાલતો હતો..

એ કહું છુ કે જયારે તારી સાથે ચાલતો હતો...
અને તારી વાતો ને સંભાળતો હતો...
જીવન ના હલોડા માણતો હતો....
અને જીંદગી ના ગમો ઉડાડતો હતો...

તારી મોટ્ટી આંખો માં...
હું ભાવી સપનાઓ જોતો હતો...
તારા કળા કેશ માં...
સવાર સાંજ નો મેળ આવતો હતો..

એ સખી આ સૌ તો હું જાણતો હતો...
તો એ તને સરખું માનતો નતો....
આવા દિવસો એ જોવાના હશે....
એ તો હું સહેજ એ

એ સખી એ સૌ તો મેં જાણ્યું ની.....
સારા સાથ નું સુખ મેં માણયુ નહિ...
આજે ભૂખ્યા ની જેમ રખડું છુ...

મળતું તું જયારે આપડે જામ્યું નહિ....



સપનાંઓ